वक्त का ये परिंदा रूका है कहाँ,
मैं था पागल जो इसे बुलाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर,
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा-2
वक्त का ये परिंदा रूका है कहाँ...
लौटता था मैं जब पाठशाला से घर,
अपने हाथों से खाना खिलाती थी माँ
रात में अपनी ममता के आँचल तले,
थपकिया देके मुझको सुलाती थी माँ
सोच के दिल में एक टीस फुटती रही,
रात भर दर्द मुझको जगाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर,
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा-2
वक्त का ये परिंदा रूका है कहाँ...
सबकी आँखों में आंसु छलक आये थे,
जब रवाना हुआ था शहर के लिए
कुछने माँगी दुवाएं की मैं खुश रहू,
कुछने मंदिर जाकर जलाएं दिए
एक दिन मैं बनूंगा बड़ा आदमी,
ये था सबर उन्हें गुदगुदाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर,
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा-2
वक्त का ये परिंदा रूका है कहाँ...
माँ ये लिखती है हर बार खत में मुझे,
लौट आया मेरे बेटे तुझे है कसम
तु गया जबसे परदेश बेचैन हूँ,
नींद आती नहीं भुख लगती है कम
कितना चाहा ना रोउ मगर क्या करूं,
खत मेरी माँ का मुझको रूलाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर,
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा-2
वक्त का ये परिंदा रूका है कहाँ,
मैं था पागल जो इसे बुलाता रहा
चार पैसे कमाने मैं आया शहर,
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा-4
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